Ras Ki Paribhasha : रस क्या है? परिभाषा, भेद और उदाहरण सहित पूरी जानकारी

Ras Ki Paribhasha

Ras Ki Paribhasha : हिंदी साहित्य और काव्य की आत्मा को समझने के लिए ‘रस’ का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। जब हम किसी कविता, कहानी, नाटक या महाकाव्य को पढ़ते हैं और हमारे मन में कोई विशेष भाव उत्पन्न होता है—जैसे प्रेम, वीरता, करुणा, हँसी या शांति—तो वही भाव रस कहलाता है। रस के बिना काव्य केवल शब्दों का समूह रह जाता है, उसमें आत्मा नहीं होती। इसी कारण आचार्यों ने कहा है—“रस ही काव्य की आत्मा है।”

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे—रस क्या है, उसकी परिभाषा, भेद, उदाहरण तथा नवरस का साहित्य में महत्व

रस की परिभाषा (Ras Ki Paribhasha)

रस वह आनंदमय अनुभूति है जो किसी काव्य या साहित्यिक रचना को पढ़ने, सुनने या देखने से पाठक या श्रोता के हृदय में उत्पन्न होती है।

आचार्य भरतमुनि के अनुसार—

“विभावानुभावसंचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”

अर्थात—
विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो—
काव्य पढ़कर मन में जो भावात्मक आनंद उत्पन्न होता है, वही रस है।

रस के तत्व

Ras Ki Paribhasha – रस की उत्पत्ति के लिए तीन प्रमुख तत्व आवश्यक होते हैं—

  1. विभाव – जिन कारणों से भाव जागृत होता है
  2. अनुभाव – भावों की बाहरी अभिव्यक्ति
  3. संचारी भाव – मन में आने-जाने वाले सहायक भाव

इन तीनों के मेल से ही रस की पूर्ण अनुभूति होती है।

रस के भेद (नवरस)

Ras Ki Paribhasha – हिंदी साहित्य में कुल नौ रस माने गए हैं, जिन्हें नवरस कहा जाता है—

1.श्रृंगार रस की परिभाषा

श्रृंगार रस वह रस है जिसमें प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और दाम्पत्य भाव की अभिव्यक्ति होती है। जब काव्य या साहित्यिक रचना को पढ़ने से मन में प्रेम, अनुराग, मिलन या विरह का भाव जागृत हो, तब वहाँ श्रृंगार रस होता है।

स्थायी भाव – रति

सरल शब्दों में—

जहाँ प्रेम और सौंदर्य का मधुर वर्णन हो, वहाँ श्रृंगार रस होता है।

श्रृंगार रस के भेद

श्रृंगार रस के दो भेद माने गए हैं—

1. संयोग श्रृंगार

जब नायक-नायिका के मिलन, प्रेम, आनंद और हर्ष का वर्णन हो, उसे संयोग श्रृंगार कहते हैं।

उदाहरण

नयन मिले तो बात बढ़ी, मुस्कान से मन हर लिया।

2. वियोग श्रृंगार

जब नायक-नायिका के विछोह, विरह, तड़प और पीड़ा का वर्णन हो, उसे वियोग श्रृंगार कहते हैं।

उदाहरण

बिन साजन सूनी रैना, आँसू बनकर बहती नैना।

श्रृंगार रस के उदाहरण

1. चंद्र बदन, मृगनयन, अधर सुधा-सी,
देखत ही मन मोहित हो जाए।

2. प्रिय के स्पर्श से खिल उठा हृदय,
प्रेम की गंगा बहने लगी।

नोट – श्रृंगार रस को रसों का राजा कहा जाता है, क्योंकि यह मानव जीवन की सबसे कोमल और सुंदर भावना—प्रेम—की अभिव्यक्ति करता है। हिंदी साहित्य में यह रस अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली है।

2. वीर रस की परिभाषा

वीर रस वह रस है जिसमें साहस, पराक्रम, उत्साह, शौर्य, बलिदान और वीरता का भाव प्रकट होता है। जब किसी काव्य, कथा या नाटक को पढ़कर मन में देशभक्ति, युद्ध, आत्मबलिदान या अदम्य साहस की भावना जागृत हो, तब वहाँ वीर रस होता है।

स्थायी भाव – उत्साह

सरल शब्दों में—

जहाँ वीरता और साहस का भाव हो, वहाँ वीर रस होता है।

वीर रस के उदाहरण

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

सीने पर गोली खाकर भी सैनिक आगे बढ़ता गया।

मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर कर दिए।

रणभूमि में गूँजी ललकार, शत्रु दल थर्रा उठा।

नोट – वीर रस साहित्य में उत्साह और प्रेरणा का संचार करता है। यह रस पाठक में आत्मविश्वास, देशप्रेम और साहस की भावना जगाता है। इसी कारण वीर रस को प्रेरणादायक रस माना जाता है।

3. करुण रस की परिभाषा

करुण रस वह रस है जिसमें दुख, शोक, पीड़ा, करुणा और वेदना का भाव प्रकट होता है। जब किसी काव्य, कथा या नाटक को पढ़ने से पाठक या श्रोता का हृदय दया और सहानुभूति से भर जाता है तथा मन में विषाद उत्पन्न होता है, तब वहाँ करुण रस होता है।

स्थायी भाव – शोक

सरल शब्दों में—

जहाँ दुख और करुणा का मार्मिक वर्णन हो, वहाँ करुण रस होता है।

भाव – दुख, शोक, करुणा
स्थायी भाव – शोक
उदाहरण

माँ की ममता छिन गई, बालक रोता रह गया।

करुण रस के उदाहरण

माँ की ममता छिन गई, बालक बिलख-बिलख कर रोया।

सूने आँगन में दीया बुझा, आँखों से आँसू बह चले।

युद्ध ने उजाड़ दिए घर, हर ओर सिसकियाँ गूँज उठीं।

पिता की अर्थी देखकर पुत्र का कलेजा फट गया।

नोट – करुण रस साहित्य को संवेदनशील और मानवीय बनाता है। यह रस पाठक के मन में दया, सहानुभूति और करुणा की भावना जागृत करता है। करुण रस के बिना साहित्य भावहीन और नीरस प्रतीत होता है।

4. हास्य रस की परिभाषा

हास्य रस वह रस है जिसमें हँसी, विनोद, मनोरंजन और हास-परिहास का भाव प्रकट होता है। जब किसी काव्य, कहानी, नाटक या संवाद को पढ़ने या सुनने से मन में मुस्कान या ठहाका उत्पन्न हो, तब वहाँ हास्य रस होता है।

स्थायी भाव – हास

सरल शब्दों में—

जहाँ हँसी और मनोरंजन का भाव हो, वहाँ हास्य रस होता है।

हास्य रस के उदाहरण

टोपी उलटी पहनकर नेता जी भाषण देने लगे।

बंदर ने शीशा देखा, खुद को देखकर डर गया।

गंभीर चेहरे वाले मास्टर जी भी मज़ाक में हँस पड़े।

गलत ट्रेन में चढ़कर यात्री ने स्टेशन ही बदल डाला।

नोट – हास्य रस साहित्य को रोचक और आनंददायक बनाता है। यह मन के तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। हास्य रस मानव जीवन में उल्लास और प्रसन्नता का संचार करता है।

5. रौद्र रस की परिभाषा

रौद्र रस वह रस है जिसमें क्रोध, उग्रता, प्रतिशोध और हिंसक भाव की अभिव्यक्ति होती है। जब किसी काव्य, कथा या नाटक को पढ़कर मन में भयानक क्रोध और उत्तेजना उत्पन्न हो, तब वहाँ रौद्र रस होता है।

स्थायी भाव – क्रोध

सरल शब्दों में—

जहाँ तीव्र क्रोध और उग्र भाव का वर्णन हो, वहाँ रौद्र रस होता है।

रौद्र रस के उदाहरण

आँखें अंगार-सी दहकीं, तलवार म्यान से बाहर आई।

अन्याय सुनते ही राजा का क्रोध भड़क उठा।

क्रोधित सिंह की दहाड़ से वन काँप उठा।

शत्रु को देखते ही योद्धा आग-बबूला हो गया।

नोट – रौद्र रस साहित्य में उग्रता और प्रतिकार की भावना को व्यक्त करता है। यह रस पाठक को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है और कथा में तीव्रता उत्पन्न करता है।

7. वीभत्स रस की परिभाषा

वीभत्स रस वह रस है जिसमें घृणा, जुगुप्सा, अरुचि और वितृष्णा का भाव प्रकट होता है। जब किसी काव्य, कथा या दृश्य को पढ़ने या देखने से मन में घिन और घृणा उत्पन्न हो जाए, तब वहाँ वीभत्स रस होता है।

स्थायी भाव – जुगुप्सा

सरल शब्दों में—

जहाँ घृणित और विकृत भावों का वर्णन हो, वहाँ वीभत्स रस होता है।

वीभत्स रस के उदाहरण

सड़ी-गली लाश को देखकर सबने मुँह फेर लिया।

गंदी नाली से उठती दुर्गंध सहन न हो सकी।

कीचड़ से सने वस्त्र देखकर मन घिन से भर गया।

खून और गंदगी से भरा दृश्य देखकर वह काँप उठा।

नोट – वीभत्स रस साहित्य में घृणा और अरुचि की भावना को प्रकट करता है। यह रस पाठक को अस्वच्छता, अमानवीयता और कुरूपता से दूर रहने की सीख देता है।

8. अद्भुत रस की परिभाषा

अद्भुत रस वह रस है जिसमें आश्चर्य, विस्मय, चमत्कार और अनोखेपन का भाव प्रकट होता है। जब किसी काव्य, कथा या दृश्य को पढ़ने या देखने से मन में चकित होने की अनुभूति उत्पन्न हो, तब वहाँ अद्भुत रस होता है।

स्थायी भाव – विस्मय

सरल शब्दों में—

जहाँ आश्चर्य और चमत्कार का भाव हो, वहाँ अद्भुत रस होता है।

अद्भुत रस के उदाहरण

आकाश में उड़ता महल देखकर सब स्तब्ध रह गए।

एक ही क्षण में साधु का रूप देवता-सा चमक उठा।

नन्हा बालक पर्वत उठा ले, यह दृश्य सबको अचंभित कर गया।

जादूगर की एक छड़ी से कबूतर निकल आया।

नोट – अद्भुत रस साहित्य को रोमांचक और रहस्यमय बनाता है। यह रस पाठक के मन में विस्मय और कौतूहल की भावना जगाकर रचना को विशेष प्रभावशाली बनाता है।

9. शांत रस की परिभाषा

शांत रस वह रस है जिसमें वैराग्य, आत्मिक शांति, निर्वेद और मोक्षभाव की अभिव्यक्ति होती है। जब किसी काव्य, कथा या विचार को पढ़ने से मन में मोह-माया से विरक्ति और आंतरिक शांति का अनुभव हो, तब वहाँ शांत रस होता है।

स्थायी भाव – निर्वेद

सरल शब्दों में—

जहाँ वैराग्य और आत्मिक शांति का भाव हो, वहाँ शांत रस होता है।

शांत रस के उदाहरण

संसार की नश्वरता समझ, साधु ध्यान में लीन हो गया।

मोह त्यागकर आत्मज्ञान की राह उसने चुन ली।

वन में तप करता योगी, मन से समस्त विकार त्याग चुका था।

जीवन का सत्य जानकर मन पूर्णतः शांत हो गया।

नोट – शांत रस साहित्य में आध्यात्मिक गहराई और संतुलन प्रदान करता है। यह रस पाठक को संयम, वैराग्य और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है और मन को स्थिरता प्रदान करता है।

रस का साहित्य में महत्व

रस के बिना साहित्य अधूरा माना जाता है। रस ही पाठक को रचना से जोड़ता है और उसे भावनात्मक स्तर पर प्रभावित करता है। विभिन्न रसों के माध्यम से लेखक समाज, संस्कृति और जीवन के विविध पहलुओं को प्रस्तुत करता है।

  • श्रृंगार रस प्रेम की मधुरता दिखाता है
  • वीर रस देशभक्ति और साहस जगाता है
  • करुण रस संवेदना पैदा करता है
  • शांत रस आत्मिक शांति प्रदान करता है

निष्कर्ष – रस हिंदी साहित्य की आत्मा है। इसके माध्यम से ही साहित्य जीवंत बनता है और पाठक के हृदय को स्पर्श करता है। नवरस मानव जीवन की सभी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए रस का अध्ययन न केवल परीक्षा के लिए, बल्कि साहित्य की गहराई को समझने के लिए भी आवश्यक है।

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