जैनेन्द्र कुमार का जीवन परिचय – प्रेमचंदोत्तर युग के श्रेष्ठ कथाकार जैनेन्द्र कुमार का जन्म अलीगढ़ कौड़ियांगंज नामक कस्बे मे सन् 1905 ई.0 मे हुआ था। बल्यवस्था मे ही उनके पिता के मृत्यु हो गई। इनका पालन – पोषण इनकी माता जी और इनके मामा ने किया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल ऋषि ब्रह्मचर्य आश्रम मे हुई। सन् 1919 ई.0 मे इन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की उच्च शिक्षा के लिए इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया लेकीन सान् 1921 के असहयोग आंदोलन मे भाग लेने के कारण इनकी शिक्षा का क्रम टूट गया। सन् 1921 से 1923 के बीच इन्होंने अपनी माता की सहायत से व्यापार किया।
सन 1923 मे ये नागपुर गए। राजनीतिक पत्रों मे संवाददाता के रूप मे कार्य करने लगे। उसी समय इन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जहां इन्हे तीन माह तक जेल में ही रहना पड़ा। इन्हे स्वाध्याय की प्रवृत्ति छात्र-जीवन से ही था। जेल में स्वाध्याय के साथ ही उन्होने साहित्य-सृजन का कार्य भी प्रारम्भ किया। इनकी पहली कहानी- ‘खेल‘ सन् 1928 ई० में विशाल भारत में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद ये निस्तर साहीत्य’ ‘सृजन’ में प्रवृत्त रहें। 24 दिसम्बर सन् 1988 ई० को इनका निधन हो गया।
जैनेन्द्र कुमार जी ने कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण आदि अनेक गद्य-विधाओं को समृद्ध किया है। इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नांकित हैं—
| विधा | प्रमुख कृतियाँ |
| निबंध संग्रह | ① प्रस्तुत प्रश्न, ② जड़ की बात, ③ पूर्वोदय, ④ साहित्य का श्रेय और प्रेय, ⑤ मंथन, ⑥ सोच-विचार, ⑦ काम, ⑧ प्रेम और परिवार |
| उपन्यास | ① परख, ② सुनीता, ③ त्यागपत्र, ④ कल्याणी, ⑤ विवर्त, ⑥ सुखदा, ⑦ व्यतीत, ⑧ जयवर्धन, ⑨ मुक्तिबोध |
| कहानियाँ | ① फाँसी, ② जयसंधि, ③ वातायन, ④ नीलम देश की राजकन्या, ⑤ एक रात, ⑥ दो चिड़ियाँ, ⑦ पाजेब |
| संस्मरण | ये और वे |
| अनुवाद | ① मन्दाकिनी | नाटक ② पाप और प्रकाश | नाटक ③ | प्रेम में भगवान् | कहानी संग्रह |
जैनेन्द्र कुमार के निबन्धों की भाषा शैली
जैनेन्द्र कुमार के निबन्धों की भाषा शैली मूलतः चिन्तन की भाषा हैं। ये सोचा हुआ न लिखकर सोचते हुए ही लिखते रहते हैं। इसलिए इनके विचारों में कहीं-कहीं उलझाव आ जाता हैं। इनकी विचारात्मक शैली में प्रश्न, उत्तर, तर्क, युक्ति, दृष्टान्त आदि तत्वों का समावेश उसे गूढ़ता प्रदान करता हैं। वस्तुतः जैनेन्द्र की शैली इनकी व्यक्तित्व का ही प्रारूप हैं। हिन्दी साहित्य के विद्वानों के समक्ष ‘जैनेन्द्र’ ऐसी उलझने हैं जो पहले से भी अधिक गूढ़ हैं, इनके व्यक्तित्व का यह सुलझा हुआ उलझाव इनकी शैली में भी लक्षित होता हैं। अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए इन्होंने- विचारात्मक, विवरणात्मक, प्रश्नात्मक, भावात्मक, मनोविश्लेषणात्मक आदि शैलियों का प्रयोग किया हैं।


