भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का गठन, शक्तियाँ और कार्यप्रणाली

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का गठन

“भारतीय सर्वोच्च न्यायालय विश्व के सभी सर्वोच्च न्यायालयों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।” — कृष्णास्वामी अय्यर

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का गठन भारत एक संघीय राज्य है। संविधान द्वारा केंद्र व राज्य की शक्तियों का अलग-अलग विभाजन किया गया है। संपूर्ण देश में एकीकृत न्याय-व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत संपूर्ण देश के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है।

संघीय शासन-व्यवस्था में केंद्र तथा राज्यों के बीच अथवा भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच, नागरिकों एवं सरकार के बीच यदि किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है तो उसका समाधान न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) द्वारा ही किया जाता है। हमारे देश में संविधान की सर्वोच्चता स्थापित है। न्यायपालिका एक ओर संविधान की व्याख्या करती है तो दूसरी ओर केंद्र तथा राज्य के कानूनों का पुनरीक्षण करके उनको संविधान द्वारा निर्धारित मर्यादाओं में संयमित करने का प्रयास करती है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय संविधान की प्रभुता व सर्वोच्चता का संरक्षक, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक एवं राष्ट्रपति का परामर्शदाता है।

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का गठन न्यायधीशों की नियुक्ति और उनकी योग्यता के अनुसार कुछ इस प्रकार से हुआ आप इसे पढ़ सकते है –

न्यायाधीशों की नियुक्ति

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। परंपरानुसार सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति वरिष्ठता के आधार पर करता है। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की सलाह पर करता है। वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायालय में एक प्रधान न्यायाधीश एवं 30 अन्य न्यायाधीश हैं। संसद कानून बनाकर समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या में परिवर्तन कर सकती है।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए कुछ अनिवार्य योग्यताओं का होना आवश्यक है। व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है। वह किसी एक या अधिक उच्च न्यायालयों में कम-से-कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश रह चुका हो या किसी एक या अधिक उच्च न्यायालयों में 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका हो। इसके अलावा वह राष्ट्रपति की दृष्टि में उच्चकोटि का विधिवेत्ता होना चाहिए और उसकी आयु 65 वर्ष से कम होनी चाहिए।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का गठन मे कार्यकाल एवं वेतन

सर्वोच्च न्यायालय का प्रत्येक न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्य कर सकता है। वह चाहे तो इसके पूर्व भी राष्ट्रपति को अपना लिखित त्याग-पत्र देकर पद मुक्त हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश को ₹ 2,80,000/- रुपए प्रति माह वेतन एवं अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,50,000/- हजार प्रतिमाह वेतन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त न्यायाधीशों को निःशुल्क आवास, मासिक भत्ता, यात्रा-भत्ता, स्टाफ कार, पेट्रोल आदि की सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं।

महाभियोग प्रक्रिया

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है। उन्हें संसद ही उनके पद से हटा सकती है। सिद्धकदाचार के आधार पर संसद के दोनों सदन अलग-अलग यदि किसी न्यायाधीश के विरुद्ध विशेष बहुमत से (कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत) महाभियोग का प्रस्ताव पास कर दें और प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति के पास भेज दें तो राष्ट्रपति उस न्यायाधीश को पद से हटा सकेगा।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि वह कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए संविधान में कई महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये हैं।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद को संविधान द्वारा पूरी सुरक्षा प्रदान की गयी है। न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है, जिसमें संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।

न्यायाधीशों को वेतन व भत्ते भारत की संचित निधि से दिये जाते हैं तथा इनके कार्यकाल में इनके वेतन व भत्तों में किसी प्रकार की कटौती (आपातकाल को छोड़कर) नहीं की जा सकती।

न्यायालय की न्याय-प्रक्रिया एवं न्यायाधीशों द्वारा दिये गये निर्णयों पर संसद में बहस नहीं की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय अपने प्रशासनिक कार्यों का स्वयं निरीक्षण करता है तथा अपने कर्मचारियों की नियुक्ति व उनके लिये नियम बनाने का कार्य स्वयं करता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं तथा सर्वोच्च न्यायालय अपनी अवमानना के लिए किसी भी व्यक्ति को दण्डित कर सकता है।

इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश देश के किसी भी न्यायालय में वकालत का व्यवसाय नहीं कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय को अपने तथा अपने अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यपद्धति को निर्धारित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार है।

एम० वी० पायली के अनुसार— “अपनी विविध एवं व्यापक शक्तियों के कारण सर्वोच्च न्यायालय देश के न्याय क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ संस्था है तथा देश के संविधान एवं कानूनों का संरक्षक है।”

सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ एवं कार्य

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार

इस क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत वे मामले आते हैं जिन्हें सीधे सर्वोच्च न्यायालय में स्थापित किया जा सकता है। इसमें संघीय सरकार तथा राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवाद शामिल हैं। इसके अलावा ऐसे विवाद जिनमें एक पक्ष से केन्द्र सरकार और एक या एक से अधिक राज्यों की सरकारें हों और दूसरे पक्ष से एक या एक से अधिक राज्यों की सरकारें हों, दो या दो से अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न विवाद, तथा नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा से सम्बन्धित विवाद सीधे यहाँ लाये जा सकते हैं।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय के इस क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत उसे विभिन्न उच्च न्यायालयों के तीन प्रकार के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है।

संवैधानिक अपीलों के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार उच्च न्यायालयों के ऐसे निर्णयों के विरुद्ध अपील की जा सकती है, जिनमें उच्च न्यायालय इस बात का प्रमाण-पत्र दे दे कि इस मामले में संविधान की व्याख्या से सम्बन्धित कोई विधि का प्रश्न अन्तर्निहित है।

दीवानी अपीलों में मूल संविधान के अनुसार ₹ 20 हजार की सीमा तय थी, किन्तु 30वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 1973 द्वारा यह प्रतिबन्ध समाप्त कर दिया गया है। अब दीवानी के उन सभी मुकदमों की अपील की जा सकती है, जिनके लिए उच्च न्यायालय प्रमाण-पत्र जारी कर दे।

फौजदारी अपीलों के लिए संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार तीन स्थितियाँ हैं। जब किसी अभियोग में अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अभियुक्त को रिहा कर दिया गया हो किन्तु उच्च न्यायालय द्वारा उसे मृत्युदण्ड दिया गया हो, जब उच्च न्यायालय ने मुकदमा अधीनस्थ न्यायालय से अपने पास मँगाकर मृत्युदण्ड दिया हो, या जब उच्च न्यायालय प्रमाणित कर दे कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने योग्य है।

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3. मूल अधिकारों का रक्षक

उच्चतम न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक है। मूल अधिकारों का अतिक्रमण होने पर नागरिक उच्चतम न्यायालय से अनुरोध कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए पाँच प्रकार के लेख (बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा) जारी करता है।

4. परामर्शदात्री अधिकार

भारत के राष्ट्रपति द्वारा परामर्श माँगे जाने पर अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने का अधिकार है, किन्तु राष्ट्रपति ऐसी सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।

5. अपील की विशेष आज्ञा का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार प्राप्त है कि वह सैनिक न्यायालय को छोड़कर देश के किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा दिये गये निर्णयों के विरुद्ध अपने यहाँ अपील करने की आज्ञा प्रदान करे।

6. कानूनों की वैधता पर निर्णय देने का अधिकार

संसद अथवा राज्य विधान-मण्डलों द्वारा बनाये गये कानून यदि संविधान के विरुद्ध हों, तो सर्वोच्च न्यायालय उस पर विचार कर कानून को विधि-विरुद्ध (शून्य) घोषित कर सकता है।

7. अभिलेख न्यायालय

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय भी है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों में प्रमाण (नजीर) के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं और इसकी प्रामाणिकता को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

सर्वोच्च न्यायालय का महत्व

सर्वोच्च न्यायालय संविधान का सजग प्रहरी है। संविधान के रक्षक के रूप में वह संविधान के उपबन्धों की व्याख्या करता है तथा संसद अथवा राज्य विधानमण्डलों द्वारा बनाये गये ऐसे कानूनों को, जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हों, अवैध अथवा शून्य घोषित करता है।

संविधान का संरक्षक होने के साथ-ही-साथ सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी रक्षक है। सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों को निष्पक्ष न्याय प्रदान कर उनमें आत्मविश्वास पैदा करता है। वास्तव में यह आत्मविश्वास लोकतंत्र की सफलता का मूलाधार है। सर्वोच्च न्यायालय वह संस्था है जो मूलाधिकारों को सुरक्षित रखेगी और प्रत्येक नागरिक को उन अधिकारों को दिलवायेगी जो उसे संविधान द्वारा प्रदान किये गये हैं। वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय लोकतंत्र का पहरेदार है।

महत्वपूर्ण बिन्दु

भारत का सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थित है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायालय में एक प्रधान न्यायाधीश एवं 30 अन्य न्यायाधीश हैं।

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